Tuesday, March 14, 2017

नई शुरुआत-----


जो हो चुका सो हो चुका,
तुम इक नई शुरुआत करो.
हर चीज बदलती है,
अपनी आखिरी साँस के साथ,
तुम फिर से कोई जुदा बात करो.
उजड़ गया गर शहरे-आलम सारा,
तुम फिर नया अहसास गढ़ों.
पकड़ो किसी का हाथ फिर से,
कदम मिला कर साथ बढों,
पानी में घुले नमक को तुम
अलग नहीं कर सकते,
पैदा फिर नये जज्बात करो.
जो हो चुका सो हो चुका,
तुम इक नई शुरुआत करो.

Tuesday, January 24, 2017

सरकारी विज्ञान


“देखो बच्चों गाय का मूत्र और गोबर सबसे पवित्र होता हैं” !
हाँ तुम्हारे बचपन ,सोच और काम से भी ज्यादा !
“गाय ऑक्सीजन ही लेती है और छोड़ती भी है” !
विज्ञान कुछ भी कहे सब बकवास है !
यह देवों के देव ‘वासुदेव’ का ज्ञान है !
जो इन्सान और परम्परा को जोड़ता है !
यह मान लो, पीपल का पेड़ भी रात में ऑक्सीजन छोड़ता है !
यह सब हमें पढ़ाना है शिक्षा की आड़ में,
वैज्ञानिक नजरिया जाये भाढ़ में.
और लड़कियों तुम हमेशा ध्यान रखना,
करवां चौथ का चाँद पूजने से ही होती है,
पति की लम्बी उम्र ! उसके लिए सदैव दुआएँ करना,
ताकि कूटता-पीटता रहे वो तुम्हें जीवन भर !
और अपने पति से आगे कदम रखने का दुस्साहस कभी ना करना !
यह ना शास्त्र सम्मत है और ना ही धर्म !
समझती हो ना तुम स्त्री धर्म ?
और एक बात और कभी परम्परा विरुद्ध काम ना करियो !
सुबह उठते ही पति देव, सूर्य देव को प्रणाम करियो !
अपनी संस्कृति और परम्परा का रखना ध्यान !
‘बर्बाद’ कर देगा तुम्हें आज का विज्ञान !
किताब, विज्ञान और नवल की बातों पर मत देना ध्यान !
भव सागर से तार देगा तुम्हें ‘सरकार’ और  ‘वासुदेव’ का ज्ञान !


[राजस्थान के शिक्षा मंत्री द्वारा दिए बयान पर आधारित]

Tuesday, January 17, 2017

ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर------

हमने दुश्मन ना बनाया किसी को,
ना किसी को बनाया दोस्त,
ना किसी के साथ दारू पी,
ना किसी के साथ खाया गोस्त.
ना गुटखा,तम्बाकु, खैनी खाई ,
ना बीड़ी पी,ना ही चबाया पान,
बस अपने काम में लगे रहे,
धरे कभी ना इधर-उधर कान.
मोह्ब्बत करने की धुन लगी,
पर उसमें भी हो गये फ़ैल ,
सफल मोहब्बत में  वही होता ,
जिसने खेले ऊपर वाले सब खेल.
फक्कड़ रहकर मस्त है,
करते दुनिया की सैर,
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर.

Monday, January 16, 2017

ना जाने क्यों ?

अब नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर  जाने को ,
 ना जाने क्यों ?
हालाँकि बदला कुछ खास नहीं है.
सिर्फ माता-पिता का साया उठा है ,
उस घर से , अलावा  सब वैसा ही  तो है,
भाई-भाभी, बच्चे , पडोसी सब.
पर  पता नहीं अब क्यों नहीं ,
लगता मन ,
सोचता हूँ क्या खास था तब ,
दौड़ा चला आता था मैं ,
बेवजह छुट्टियां लेकर ,
अब छुट्टी हो तब भी ,
नहीं करता मेरा मन ,
अपने घर  जाने को ,
ना जाने क्यों ?