Tuesday, August 2, 2016

जाति आख़िर क्यों नहीं जाती ???

यह जाति आख़िर हमारे व्यवहार से क्यों नहीं जाती,
कभी नाम में तो कभी काम में है खूब नज़र आती,
गाँव और शहरों में तो लोग मकानों पर लिखवाते हैं,
कहीं अग्रवाल तो कहीं ब्राह्मण सदन नज़र आते है,
जाति और समाज के नाम पर लोग संगठन बनाते हैं,
कहीं गालव समाज , कहीं सोनी समाज नज़र आते हैं,
सब कहते है जाति प्रथा व छुआछुत को दूर करो,
तो इंसान इस तरह जाति-समाजों में बँटे क्यों नज़र आते हैं ???

Friday, July 29, 2016

कहाँ हमारा लोकतंत्र है ???



इस देश में आदमी धर्म शास्त्र, वेद-पुराण
क़ुरान,बाईबिल को तो भलि-भाँति जानता है,
पर देश के संविधान को शिद्दत से कम ही मानता है.
मेरे गाँव-गली में आज भी साक्षर और निरक्षर लोगों का
जीवन धर्म-शास्त्रों से ही शासित होता है.
बहुत कम लोग होगें जिनका जीवन संविधान से प्रभावित होता है.
आज भी मासूम और निरपराध लोग पुलिस की लाते खाते हैं,
न्याय,बराबरी और समता-समानता उनके लिए हवाई बातें हैं.
अगर आज भी जनता में संविधान की थोड़ी बहुत भी समझ आ जाए,
तो इन नेताओं की क्या औकात जो धर्म, मंदिर-मस्जिद के नाम पर बाँट पाएँ.
सत्ता का स्वाद इन नेताओं की पीढ़ियों ने ही है चखना,
इसलिए जनता को धर्म, मँहगाई, ग़रीबी में है उलझाए रखना.
यह सब शासन-प्रशासन और प्रबंधन में बैठे लोगों का षडयंत्र है.
15 अगस्त को हम फिर ढूँढेगें कि कहाँ हमारा लोकतंत्र है ????

Wednesday, May 4, 2016

लोकतंत्र शर्मिन्दा है !


नेताओं के कारनामों से
लोकतंत्र शर्मिन्दा है.
मंहगाई मुँह फाड़ रही,
मंहगें लौकी,भिंडी,टिंडा है.
न्याय का गला घुट रहा,
और भ्रष्टाचारी ज़िंदा है.
दल-दल में कोई फ़र्क नही है,
सब ही करते निंदा है.
नेताओं के कारनामों से
लोकतंत्र शर्मिन्दा है.

Monday, January 18, 2016

तुम्हारा आना !


तुम्हारा आना,
एक स्वप्न का साकार होना        
था मेरे लिए,
मैं मन्नतें माँगने में
विश्वास तो नहीं करता,
पर कर्म में लगा रहा अनवरत
बिना विचलित हुए,
इस विश्वास के साथ
कि तुम आओगी एक ना एक दिन
मेरे आँगन,
परी बनकर
और तुमने कर दिखाया
एक बाप का स्वप्न साकार.
अब बारी है मेरी,
तेरे सपनों को साकार करने में
नही रखूँगा कोई कसर,
वादा है मेरा तुझसे.