Thursday, June 28, 2012

समता के दीप जले --------------

समता के  दीप जले --------------
छिन  रहा है गरीब के मूंह का निवाला
हो रहा है  शोषण चहूँ और ,
अब समता  का दीप जले  तो बात बने .
सरे आम लुटती इज्जत अबलाओं की
कोई सबला बन इन दुष्टों का नाश करे तो बात बने .
गर्भ में मारी जा रही है कन्यायें ,
इनका कोई संताप हरे तो बात बने.
नेता भ्रष्टाचार में डूबे है आकंठ ,
इनमें से कोई गाँधी बने तो बात बने .
लोकतंत्र के प्रहरी बन कर
न्याय की जो बातें  करते, करते वे ही अन्याय हैं .
इनका चेहरा साफ बने तो बात बने .
खो रहा चैनों अमन साम्प्रदायिकता के दुष्टों से ,
अमन की कोई राह खुले तो बात बने 
छीन रहा है गरीब के मुंह का निवाला
हो रहा है  शोषण चहूँ और ,
अब क्रांति का शंख बजे तो बात बने .
अब समता  के  दीप जले  तो बात बने .






Tuesday, June 26, 2012

बाप

तुम भी थे कभी बच्चे आज बाप बने हो .
जीवन में जो कुछ भी बने हो अपने आप बने हो ,
रखना  हमेशा सर आँखों पर इस नन्हें को ,
मुबारक हो तुमको पितृत्व क्या खास बने हो.











गर्व

Photo: =<>GOOD NIGHT<>=
-==-"SLEEP WELL"-==-
^^^^SWEETDREAMS^^^^


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यूँ तो सूरज का गर्वित होना वाजिब है
अपनी शान पर ,
क्योंकि अपनी रश्मियाँ फैलाता है ,
वो ज़मीं पर .

करता है रोशनी .
पर यह ज़मीं भी तो सहती है ,
धूप, सर्दी और बरसात सब.
क्यों चुप रहता है सूरज तब .
क्या दिखती नही उसे इस
ज़मीं की सहनशीलता ???

Friday, June 22, 2012

समाज --------

कभी-कभी कोई विचार दिमाग में इस कदर  कौन्धता है.
और पुराने विचारों को वह इस
तरह रौंदता है कि-
पूरे विचारों
की खिचड़ी खद-बद करने लगती है.
ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ आज !
विचार आया कि कैसे बनता है यह समाज ?
कैसे विकसित होती  है समाज
की संस्कृति, विचार, मूल्य या धारणाएं ?
और कैसे आते है हमारे पास यह विचार ?
जिन्हें कहते और मानते हैं हम अमूल्य .
पर क्या समय  के साथ बदलते हैं हमारे यह  मूल्य ?
या होते है यह साश्वत ?
समय और परिस्तिथियाँ करती है मूल्यों को प्रभावित ?
या हम निभाते [ढोते] हैं इन्हें समय और परिस्तिथियों से हुए अप्रभावित ?
सोचता रहा मैं किचिन में छौंकते हुए
सब्जि.
और
सब्जि की महक से ज्यादा मुझे प्रभावित कर रही थी विचारों की महक .
क्या आपको भी प्रभावित करती है यह
विचारों की महक???

Wednesday, June 20, 2012

बोस उवाच -----------------------

"चमचागिरी करोगे तो इनाम पाओगे
चाहे कुछ करो या न करो ,
हर जगह अपना नाम पाओगे .
चमचागिरी करोगे तो ------------------
बोस ही हमेशा सही मानते चलो,
दूध ,दही, मठ्ठा सब छानते चलो.
नौकरी से कभी न निकाले जाओगे.
चमचागिरी करोगे तो ---------------
साथियों में खामियों की करते रहो खोज .
साथी कर्मचारियों की बुराई करो रोज .
कान भरो बोस के और करते रहो मौज.
स्वर में स्वर मिलाने वालों की बनाओ एक फौज.
बोस के हमदर्दियों में पहचाने जाओगे.
चमचागिरी करोगे तो -----------------".

 








Monday, June 18, 2012

अन्याय के शोर में-------------------

घट रही है घटनाएँ जिस तेजी से इस दौर में .
घुट रही सत्य की आवाज़ अन्याय के
शोर में.
कहते कुछ है करते कुछ हैं  राजनीति की दौड़ में.
बेदाग बचा है  नवल कोई इस आपा-धापी की
होड़ में ???

Friday, June 8, 2012

क्यों ???

आखिरी छोर पर जो खड़ा है इस देश में
ग्राम्य जीवन के परिवेश में ,
उसे क्यों नहीं कोई आगे बढ़ने देता है ?
क्यों उसके हक-अधिकारों को कोई और छीन लेता है ????