| समता के दीप जले -------------- छिन रहा है गरीब के मूंह का निवाला हो रहा है शोषण चहूँ और , अब समता का दीप जले तो बात बने . सरे आम लुटती इज्जत अबलाओं की कोई सबला बन इन दुष्टों का नाश करे तो बात बने . गर्भ में मारी जा रही है कन्यायें , इनका कोई संताप हरे तो बात बने. नेता भ्रष्टाचार में डूबे है आकंठ , इनमें से कोई गाँधी बने तो बात बने . लोकतंत्र के प्रहरी बन कर न्याय की जो बातें करते, करते वे ही अन्याय हैं . इनका चेहरा साफ बने तो बात बने . खो रहा चैनों अमन साम्प्रदायिकता के दुष्टों से , अमन की कोई राह खुले तो बात बने छीन रहा है गरीब के मुंह का निवाला हो रहा है शोषण चहूँ और , अब क्रांति का शंख बजे तो बात बने . अब समता के दीप जले तो बात बने . |
समसामयिक मुद्दों पर लिखने में मेरी रूचि हमेशा से रही है और इसी का परिणाम यह कवितायेँ हैं .
Thursday, June 28, 2012
समता के दीप जले --------------
Tuesday, June 26, 2012
बाप
| तुम भी थे कभी बच्चे आज बाप बने हो . जीवन में जो कुछ भी बने हो अपने आप बने हो , रखना हमेशा सर आँखों पर इस नन्हें को , मुबारक हो तुमको पितृत्व क्या खास बने हो. |
गर्व
यूँ तो सूरज का गर्वित होना वाजिब है
अपनी शान पर ,
क्योंकि अपनी रश्मियाँ फैलाता है ,
वो ज़मीं पर .
करता है रोशनी .
पर यह ज़मीं भी तो सहती है ,
धूप, सर्दी और बरसात सब.
क्यों चुप रहता है सूरज तब .
क्या दिखती नही उसे इस
ज़मीं की सहनशीलता ???
अपनी शान पर ,
क्योंकि अपनी रश्मियाँ फैलाता है ,
वो ज़मीं पर .
करता है रोशनी .
पर यह ज़मीं भी तो सहती है ,
धूप, सर्दी और बरसात सब.
क्यों चुप रहता है सूरज तब .
क्या दिखती नही उसे इस
ज़मीं की सहनशीलता ???
Friday, June 22, 2012
समाज --------
कभी-कभी कोई विचार दिमाग में इस कदर कौन्धता है.
और पुराने विचारों को वह इस तरह रौंदता है कि-
पूरे विचारों की खिचड़ी खद-बद करने लगती है.
ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ आज !
विचार आया कि कैसे बनता है यह समाज ?
कैसे विकसित होती है समाज की संस्कृति, विचार, मूल्य या धारणाएं ?
और कैसे आते है हमारे पास यह विचार ?
जिन्हें कहते और मानते हैं हम अमूल्य .
पर क्या समय के साथ बदलते हैं हमारे यह मूल्य ?
या होते है यह साश्वत ?
समय और परिस्तिथियाँ करती है मूल्यों को प्रभावित ?
या हम निभाते [ढोते] हैं इन्हें समय और परिस्तिथियों से हुए अप्रभावित ?
सोचता रहा मैं किचिन में छौंकते हुए सब्जि.
और सब्जि की महक से ज्यादा मुझे प्रभावित कर रही थी विचारों की महक .
क्या आपको भी प्रभावित करती है यह विचारों की महक???
और पुराने विचारों को वह इस तरह रौंदता है कि-
पूरे विचारों की खिचड़ी खद-बद करने लगती है.
ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ आज !
विचार आया कि कैसे बनता है यह समाज ?
कैसे विकसित होती है समाज की संस्कृति, विचार, मूल्य या धारणाएं ?
और कैसे आते है हमारे पास यह विचार ?
जिन्हें कहते और मानते हैं हम अमूल्य .
पर क्या समय के साथ बदलते हैं हमारे यह मूल्य ?
या होते है यह साश्वत ?
समय और परिस्तिथियाँ करती है मूल्यों को प्रभावित ?
या हम निभाते [ढोते] हैं इन्हें समय और परिस्तिथियों से हुए अप्रभावित ?
सोचता रहा मैं किचिन में छौंकते हुए सब्जि.
और सब्जि की महक से ज्यादा मुझे प्रभावित कर रही थी विचारों की महक .
क्या आपको भी प्रभावित करती है यह विचारों की महक???
Wednesday, June 20, 2012
बोस उवाच -----------------------
| "चमचागिरी करोगे तो इनाम पाओगे चाहे कुछ करो या न करो , हर जगह अपना नाम पाओगे . चमचागिरी करोगे तो ------------------ बोस ही हमेशा सही मानते चलो, दूध ,दही, मठ्ठा सब छानते चलो. नौकरी से कभी न निकाले जाओगे. चमचागिरी करोगे तो --------------- साथियों में खामियों की करते रहो खोज . साथी कर्मचारियों की बुराई करो रोज . कान भरो बोस के और करते रहो मौज. स्वर में स्वर मिलाने वालों की बनाओ एक फौज. बोस के हमदर्दियों में पहचाने जाओगे. चमचागिरी करोगे तो -----------------". |
Monday, June 18, 2012
अन्याय के शोर में-------------------
घट रही है घटनाएँ जिस तेजी से इस दौर में .
घुट रही सत्य की आवाज़ अन्याय के शोर में.
कहते कुछ है करते कुछ हैं राजनीति की दौड़ में.
बेदाग बचा है नवल कोई इस आपा-धापी की होड़ में ???
घुट रही सत्य की आवाज़ अन्याय के शोर में.
कहते कुछ है करते कुछ हैं राजनीति की दौड़ में.
बेदाग बचा है नवल कोई इस आपा-धापी की होड़ में ???
Friday, June 8, 2012
क्यों ???
आखिरी छोर पर जो खड़ा है इस देश में
ग्राम्य जीवन के परिवेश में ,
उसे क्यों नहीं कोई आगे बढ़ने देता है ?
क्यों उसके हक-अधिकारों को कोई और छीन लेता है ????
ग्राम्य जीवन के परिवेश में ,
उसे क्यों नहीं कोई आगे बढ़ने देता है ?
क्यों उसके हक-अधिकारों को कोई और छीन लेता है ????
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