कभी-कभी कोई विचार दिमाग में इस कदर कौन्धता है.
और पुराने विचारों को वह इस तरह रौंदता है कि-
पूरे विचारों की खिचड़ी खद-बद करने लगती है.
ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ आज !
विचार आया कि कैसे बनता है यह समाज ?
कैसे विकसित होती है समाज की संस्कृति, विचार, मूल्य या धारणाएं ?
और कैसे आते है हमारे पास यह विचार ?
जिन्हें कहते और मानते हैं हम अमूल्य .
पर क्या समय के साथ बदलते हैं हमारे यह मूल्य ?
या होते है यह साश्वत ?
समय और परिस्तिथियाँ करती है मूल्यों को प्रभावित ?
या हम निभाते [ढोते] हैं इन्हें समय और परिस्तिथियों से हुए अप्रभावित ?
सोचता रहा मैं किचिन में छौंकते हुए सब्जि.
और सब्जि की महक से ज्यादा मुझे प्रभावित कर रही थी विचारों की महक .
क्या आपको भी प्रभावित करती है यह विचारों की महक???
और पुराने विचारों को वह इस तरह रौंदता है कि-
पूरे विचारों की खिचड़ी खद-बद करने लगती है.
ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ आज !
विचार आया कि कैसे बनता है यह समाज ?
कैसे विकसित होती है समाज की संस्कृति, विचार, मूल्य या धारणाएं ?
और कैसे आते है हमारे पास यह विचार ?
जिन्हें कहते और मानते हैं हम अमूल्य .
पर क्या समय के साथ बदलते हैं हमारे यह मूल्य ?
या होते है यह साश्वत ?
समय और परिस्तिथियाँ करती है मूल्यों को प्रभावित ?
या हम निभाते [ढोते] हैं इन्हें समय और परिस्तिथियों से हुए अप्रभावित ?
सोचता रहा मैं किचिन में छौंकते हुए सब्जि.
और सब्जि की महक से ज्यादा मुझे प्रभावित कर रही थी विचारों की महक .
क्या आपको भी प्रभावित करती है यह विचारों की महक???
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