Friday, June 22, 2012

समाज --------

कभी-कभी कोई विचार दिमाग में इस कदर  कौन्धता है.
और पुराने विचारों को वह इस
तरह रौंदता है कि-
पूरे विचारों
की खिचड़ी खद-बद करने लगती है.
ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ आज !
विचार आया कि कैसे बनता है यह समाज ?
कैसे विकसित होती  है समाज
की संस्कृति, विचार, मूल्य या धारणाएं ?
और कैसे आते है हमारे पास यह विचार ?
जिन्हें कहते और मानते हैं हम अमूल्य .
पर क्या समय  के साथ बदलते हैं हमारे यह  मूल्य ?
या होते है यह साश्वत ?
समय और परिस्तिथियाँ करती है मूल्यों को प्रभावित ?
या हम निभाते [ढोते] हैं इन्हें समय और परिस्तिथियों से हुए अप्रभावित ?
सोचता रहा मैं किचिन में छौंकते हुए
सब्जि.
और
सब्जि की महक से ज्यादा मुझे प्रभावित कर रही थी विचारों की महक .
क्या आपको भी प्रभावित करती है यह
विचारों की महक???

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